बुधवार, 26 मई 2010

सत्संग {लघुकथा} सन्तोष कुमार "प्यासा"

कल ही एक मित्र मेरे पास आए और बोले "शहर में एक बड़े ही पहुंचे हुए पंडित जी आएं है ! वे बड़े ही ज्ञानवान समाजसेवी और नेक ह्रदय के व्यक्ति हैं ! १५ दिन से शहर में उनका सत्संग चल रहा है !"
तो मै क्या करूँ जी वैसे भी आपको ज्ञेय हैं की मुझे सत्संग वत्संग में ज्यादा दिलचस्पी नहीं है ! मैंने उनसे कहा ! फिर भी, चलिए जी घूम आइएगा, वैसे भी घर पर क्या करेंगे ! उन्होंने कहा ! उनके अनुरोध पर मैंने सोंचा "चलो भई घूम आते है !" हम दोनों सत्संग स्थल की और रवाना हुए ! कुछ ही देर में सत्संग स्थल पहुँच गए ! सत्संग स्थल में भव्य सजावट थी ! जगह जगह पर गेंदा गुलाब के फूल सजे थे ! हर तरफ फीड थी !
मैंने अपने मित्र से कहा "भई पंडित जी कहाँ है ! यहाँ तो भीड़ ही भीड़ है ! कब आएंगें आपके पंडित जी ! अजी सब्र करिए पंडित जी नियम के पक्के है, आ जाएँगे वो लो आ गए पंडित जी ! मित्र ने बताया !
पंडित जी का श्रीमुख देख कर मेरा माथा ठनका ! मैंने मित्र से कहा " शीघ्र ही यहाँ से चलिए" ! अजी क्या हुआ , उन्होंने पूंछा ! पहले यहाँ से शीघ्र प्रस्थान करें फिर बताता हूँ ! मैंने कहा ! सत्संग स्थली के बाहर आकर हम दोनों एक वृक्ष के पास खड़े हो गए ! "हुआ क्या आखिर आप वहां से क्यों चले आए" मित्र ने उत्सुकता से पूंछा ! आपके पंडित जी से मैं परसों मिल चूका हूँ रेलवे स्टेशन पर, उनकी समाज सेवा, महान विचार एवं उनके सत्संग का साक्षात् श्रवण एवं दर्शन किया है मैंने ! मैंने उनसे कहा ! "परसों, हँ परसों तो पंडित जी को एक यजमान के यहाँ जाना था ! क्या हुआ था परसों" मित्र ने पूंछा !
हुवा यूँ की मै परसों अपने मामा जी को छोड़ने स्टेशन गया था ! वहीँ पर एक वृद्ध अपाहिज फकीर भीख मांग रहे थे ! जब फकीर ने पंडित जी के पास जाकर कहा "अल्लाह के नाम पर कुछ दे दो, दो दिन से कुछ नही खाया " तो पंडित जी ने उसे दुत्कार्ते हुए भगा दिया ! और अपने यजमान से बोले "पता नही कहा कहा से चले आते है , उपर से अल्लाह अल्लाह चिल्लाते है , मुसलमानो की वजह से देश मे दंगा फ़साद होता है !" मैने उन्हे पूरी बात बताई ! मेरी बात सुनकर मेरे मित्रा कुछ न कह सके ! और मौन धारण किए घर की ओर प्रस्थान कर लिए !

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बुधवार, 19 मई 2010

क्या खूब सच बोलने का अंजाम हो रहा है {कविता} सन्तोष कुमार "प्यासा"

जो उचित नहीं है हर जगह वो काम हो रहा है

कल तक था जिसपर सबको भरोसा

आज वही बेवजह बदनाम हो रहा है

होना था जिस काम को परदे में

पता नहीं क्यों सरेआम हो रहा है

दुनिया में बढ़ रही है आबादी इस कदर

जमी को छोडिये, अजी आसमां नीलाम हो रहा है

बईमानी और घूसखोरी की चल पड़ी प्रथा ऐसी

जो जितना बदनाम है, उसका उतना नाम हो रहा है

कही मर रहे है भूख से लोग

तो किसी के यहाँ खा पीकर आराम हो रहा है

झूठ बोलना पाप है इतना तो सुना था

क्या खूब सच बोलने का अंजाम हो रहा है !

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सोमवार, 17 मई 2010

प्यार {कविता} सन्तोष कुमार "प्यासा"

लोग कहते है की प्यार सिर्फ एक बार होता है !



लेकिन जब भी मै तुम्हे सपनो में पाता हूँ



या किसी कारणवश उदास हो जाता हूँ



जब भी मै तुम्हे सुनता हूँ



या तन्हाइयों में सपने बुनता हूँ



जब तुम्हे देखता हूँ



या खामोशियों में तुम्हे महसूस करता हूँ



मुझे हर बार तुमसे प्यार हो जाता है



गहरा और गहरा !

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जो वो आ जाए एक बार ***** {कविता} ***** सन्तोष कुमार "प्यासा"


इस कविता को मैंने "महादेवी वर्मा" की कविता "जो तुम आ जाते एक बार" से, प्रेरित होकर लिखा है

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घनीभूत पीड़ा में ह्रदय डूबा

अश्रुओं संग बह रहा विषाद

जल बिन मीन तडपे जैसे

तडपाए, प्रेम उन्माद

फिर सजीव हो जाए आसार

जो वो आ जाएं एक बार

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उसे पाने की बढ़ी लालसा ऐसी

पल पल होती चाहत प्रखर

ह्रदय के कोरे पृष्ठों में

लिख दो आकर, प्रिताक्षर

मेरे मन के उपवन में छा जाए बहार

जो वो आ जाएं एक बार

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अलि कलि पर जब मंडराए

नभ पर विचरें जब विहंग

खो जाऊं आलिंगन में उसकी

मन में उठे ऐसी तरंग

बज उठें ह्रदय के तार तार

जो वो आ जाएं एक बार

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मेरे मस्तिष्क के हर कोने में छाई

उसके स्मृति की सुवासित सुरभि

अब न रुके आवेग अनुरक्ति का

समय, काल, अंतराल बताए

प्रीत न दाबे दबी

एक बने जीवन का आधार

जो वो आ जाएं एक बार

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रविवार, 16 मई 2010

नव जीवन ******** {कविता} ******** सन्तोष कुमार "प्यासा"

ओर से छोर तक बादलों का विस्तार


ललित फलित मनभावन संसार


गूँज रहा दिग-दिगंत तक कोयल का मधुर स्वर


बह रही दसो दिशाओं में खुशियों की लहर


हो रहा आनंद का उदगम, ये अदभुत क्षण है अनुपम


आशाओं के गगन से सुधा रही बरस


तृप्त हुए सभी, चख कर ये सरस रस


टूट रहा जाति, पाति का झूठा भ्रम


उदित हुआ सूर्य लेकर नव जीवन

 
सौहार्द की बूंदों में, मिलकर भीगे हम

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बुधवार, 12 मई 2010

"प्रेम", "प्रकृति" और "आत्मा" {एक चिंतन} सन्तोष कुमार "प्यासा"

सृष्टि अपने नियम पूर्वक अविरल रूप से चल रही है ! सृष्टि अपने नियम पर अटल है, किन्तु वर्तमान समय में मनुष्य के द्वारा कई अव्यवस्थाए फैलाई जा रही है ! मनुष्य सृष्टि के नियमो के मार्ग में बाधा उत्पन्न कर रहा है ! मनुष्य अपनी अग्यांताओ के कारण उन चीज़ों को प्रधानता दे रहा है जिसको "प्रेम, प्रक्रति, और आत्मा" ने कभी बनाया ही नहीं था ! जाती धर्म, मजहब, देश, राज्य, क्षेत्र और भाषा के नाम पर मनुष्य एक दूसरो को मारने पर तुला है !वर्तमान समय में मनुष्य की बुद्धि इतनी ज्यादा भ्रमित हो गई है की वह दो प्रेमियों के प्रेम से ज्यादा अपने द्वारा बनाए गए झूठे आदर्शो और जाती धर्म को महत्व दे रहा है ! अपनी झूठी शान के लिए एक मनुष्य दुसरे मनुष्य का रक्त जल की भांति बहा रहा है ! मनुष्य के इन्ही क्रियाकलापों से चिंतित होकर एक दिन एक गुप्त स्थान पर एकत्रत्रित हुए "प्रेम, प्रक्रति और आत्मा" !


प्रकृति ने आत्मा से कहा - आपके द्वारा रचित सृष्टि में ये क्या हो रहा है ! जाती धर्म और मजहब के नाम एक दुसरे की हत्या करना मनुष्य के लिए अदनी सी बात रह गई है ! आपने तो अपने द्वारा रचित सृष्टि में जाती धर्म आदि को स्थान ही नहीं दिया था ! आपके द्वारा तो केवल -

              आत्मन आकाश: सम्भूत: आकाशाद्वायु


             वायोरग्नि: आग्नेराप: अद्भ्यां प्रथ्वी


अर्थात- आप से (आत्मा से) आकाश, आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल और जल से प्रथ्वी की उत्त्पत्ति हुई ! तत्पश्चात प्रेम के संयोग से जीवन की उत्पत्ति हुई ! मेरे और मनुष्य की उत्पत्ति का कारण आप (आत्मा) और प्रेम है !फिर भी न जाने मनुष्य प्रेम को प्रधानता नहीं दे रहा ! बल्कि जाती धर्म और मजहब के नाम पर दो प्रेमियों का जीवन ही छीन लिया जाता है ! वैसे भी यदि निष्पक्ष होकर देखा जाए तो ज्ञात होता है की जाती धर्म का अपना कोई अस्तित्व ही नहीं है ! मनुष्य जिन्हें अपना भगवान मानते है या आदर्श मानते है, उन्होंने अपने काल में कभी भी जाती धर्म की तुच्छता को नहीं देखा ! राम ने सबरी के झूठे बेर खाए ! कृष्ण ने सुदामा के पैर धोए ! 


कृष्ण ने सुदामा के पैर धोए ! भीम ने राक्षसी से विवाह किया ! महादेव शंकर तो विशेषकर राक्षसों से प्रेम करते थे ! फिर आखिर मनुष्य किस धर्म की बात करता है या किस भगवान अथवा महापुरुष का अनुसरण करता है !


इस पर आत्मा ने कहा, जब मै मनुष्य के शरीर में रहती हु तब मुझ पर मन की वृत्तियाँ हावी हो जाती है ! जो मनुष्य से अनैतिक कार्य करवाती है ! जो मनुष्य अपने ज्ञान बल से वास्तविकता को जानकर, मन की वृत्तियों को तोड़कर अपनी वास्तविकता को पहचान लेता है , वह सभी जीवों से प्रेम करने लगता है ! किन्तु वर्तमान समय का मनुष्य अपनी बुराइयों में इतना ज्यादा लिप्त है की वह स्वयम इनसे मुक्त होना नहीं चाहता ! बल्कि उल्टा समाज में कुरीतिओं को जन्म देता है ! फिर रोता और हँसता है ! वर्तमान समय का मनुष्य सिर्फ भक्ति का दिखावा कर रहा है ! यदि वह सच्चा भक्त होता, तो राम की तरह सबरी के झूठे बेर खता ! अर्थात जाती धर्म और मजहब न देखता ! या फिर उसने कभी कृष्ण या किन्तु अथवा पांड्वो को अपना आदर्श माना होता तो कृष्ण की तरह सुदामा के पैर धोता ! अर्थात अपने मित्र के सुख दुःख में उसका साथ देता ! यदि किसी माँ ने कुंती को अपना आदर्श माना होता तो कुंती की तरह अपनी संतान को राक्षसी से विवाह करने का आदेश देती ! अर्थात जाती पाती को कोई मायने नहीं देती ! यदि किसी पिता ने दशरथ को अपना आदर्श माना होता तो अपने पुत्र की शादी उसी लड़की से कराता जिससे की वह प्रेम करता है ! वर्तमान पिता ने तो हिरन्यकश्यप को  अपना आदर्श माना है, जो अपनी झूठी शान के लिए अपनी संतान की भी हत्या करने से नहीं चूकता !
इस पर प्रकृति बोली - तो अब क्या होगा ? क्या अब सृष्टि व्यवस्थित नहीं होगी ? 


आत्मा ने कहा- जब मनुष्य अपने कर्तब्यों को भूलकर कुकृत्यों में लिप्त हो जाता है ! तब ऐसी दशा में प्रकृति का कर्तब्य बनता है की वह मनुष्य को उचित राह पर लाए ! अर्थात ऐसी स्थिति में प्रक्रति को अपना रौद्र रूप दिखाना चाहिए तथा मनुष्य एवं उसके द्वारा फैलाए गए कुकृत्यों का समूल नाश कर दे !


यह सुनकर प्रेम चुप न रहा, वह बोला मनुष्य हमारी उत्तपत्ति है ! इस प्रकार मनुष्य हमारी संतान है ! हम अपनी संतानों को कैसे समाप्त कर सकते है !
आत्मा ने कहा, तुम्हारा कहना भी उचित है ! हमने मिलकर सृष्टि और मनुष्य का निर्माण किया है ! इसका समूल नाश करना उचित नहीं है ! इसके लिए सिर्फ एक ही मार्ग है ! जब तक इस सृष्टि में तुम (प्रेम) हो तब तक इस सृष्टि का नाश नहीं होगा ! किन्तु जिस दिन इस सृष्टि से तुम्हारा अस्तित्व मिट जाएगा, या मनुष्य तुम्हे भूल जाएगा ! उसी क्षण इस सृष्टि का समूल नाश हो जाएगा !





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बुढिया -------- {लघुकथा} ----------- सन्तोष कुमार "प्यासा"




कल शाम को पढने के बाद सोंचा कुछ सब्जी ले आई जाए ! यही उद्देश्य लेकर सब्जी मंडी पहुँच गए ! मंडी में बहुत भीड़ थी ! दुकानदार चिल्ला-चिल्ला कर भाव बता रहे थे ! सब अपनी अपनी सुध में थे ! तभी मेरी नजर एक ऐसे स्थान पर पड़ी जहां पर सड़ी सब्जिओं का ढेर पड़ा था ! जिसके पास करीब ५५-६० वर्ष की एक वृद्धा बैठी थी ! उसके उसके पूरे बाल चाँदी के रंग के थे ! चेहरे पर अजीब सी शिकन और चिंता की लकीरे साफ़ झलक रही थी ! तन पर हरे रंग की जीर्ण मलिन साड़ी और एक कपडे का थैला उसके पास था ! सब्जी के ढेर से वह लोगों की नजरें बचाकर पालक के पत्तों को अपने थैले में रख रही थी ! पहले वह सरसरी निगाह से लोगों को देखती फिर पालक के सही पत्तों का चुनाव कर अपने थैले में रख लेती ! इस दृश्य को देख कर मैंने उन तमाम लोगों और अपने आप को धिक्कारा ! मेरे मन ने मुझसे कहा "तू इस दीन, दुखिया, असहाय वृद्धा की मज़बूरी को तमाशे की तरह देख रहा है ! मै अपने मन की बातों को सुन ही रहा था, तभी दो व्यक्ति आए उनमे से एक ने बिना कुछ बोले पूंछे उस वृद्धा का थैला उठा कर दूर फेंक दिया ! दुसरे व्यक्ति ने चिल्ला कर कहा " क्यू री बुढिया एक बार की बात तेरे दिमाग में नहीं घुसती क्या ? कल ही तुझसे कहा था न इस ढेर से दूर रहना, ये सब्जी जानवरों के चाराबाज़ार में बेचने के लिए है तेरे लिए नहीं !" बेचारी वृद्धा मजबूरीवस् निरुत्तर थी ! उसकी आँखों से मजबूरी की धारा बह निकली ! वह उठी और अपना थैला लेकर चली गई !

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